Tuesday, September 9, 2014

Ganesha, Water Pollution and Misplaced Priority.

This is a guest post by my friend SimhaNet

What a misplaced priority: The daughter of an English Professor eloped to get married without parental consent and left a note on the table "I am runing away with some guy". Both mother and father were upset, but for different reasons. The mother was naturally upset and crying that her daughter ran away with an unknown guy and was certainly worried about her while the professor father was upset and feeling shameful that an English Professor's daughter doesn't know the spelling of the word "running"
Similarly, While beef industry is the one the most polluting and leaving footprints of Green House Gases we are worried about Ganesh murties.

Global Warming: As per the National Academy of sciences Agriculture accounts for 29% of the total Antrhopogenic (pollution originating from human activity) Green House Gas (GHG) emissions. And 86% of this GHG is coming during the production of the food. And you know what? Its the Beef and Pork that are the major contributors of the GHGs.A whopping 375 grams of GHG carbon dioxide (and CH4 Methane even more dangerous) is produced for every 100gms of beef produced, and 100gms of GHGs for every 100gms of Pork. All with a heavy wastage of water,land and torturing,extreme suffering of millions of animals every year. Literally flowing rivers of blood of these mute helpless animals.

Elephant is the new Dinosaur: The greed and craze for ivory products by the new middle class and rich in Asia have shot up the demand in the black markets and hundreds of Elephants are right now being trapped, slaughtered by poachers for the sake of ivory tusks. At this rate our grand children might not see a real alive elephant. However a Hollywood movie 'Elephant Park' can be a blockbuster and we can watch in an iMax theater.

Ganesha festival is social unifier:
On the other hand the Ganesha festival apart from the devotion and festivity promotes love for the elephant, connecting with nature by offering 21 types of plant leaves, reminding of our social/community involvement during freedom struggle led by Bala Gangadhar Tilak, and of course supporting thousands of poor makers on the road side. If we go over-board and swallow the guilt fed by Red-Bindi English-speaking Anchors and Commie-Liberals about Hindu festivals polluting the environment then we are in a nice trap, feeling good about using a clay murti and saving the Earth or not celebrating at all. Yes, go with a clay murti but don't feel bad if you don't use clay murti. The spirit and essence is more precious and helps govern our world view in the long run. I this time got a "non-clay" murti and celebrated with no guilt at all.
While the house is on fire if we are more worried about the wall hanging in the living room then it is certainly a misplaced priority
Listen to this Ganesha Atharvasheersha if you find time

Monday, August 4, 2014

Siewdass Sadhu and Temple in the Sea

सागर में मंदिर और  एक अनन्य भक्त का अदम्य साहस


लगभग अकेले दम पर अथक प्रयास, दृढ़ता, अदम्य साहस, और औपनिवेशिक उत्पीड़न के बावजूद वाटरलू खाड़ी, मध्य त्रिनिदाद में समुद्र तट से
पांच सौ फीट दूर एक मंदिर का निर्माण ।  एक बंधुवा मजदुर और गरीब भक्त शिवदास साधु हमेशा के लिए अमर बन गए है और प्रेरित कर है एक त्रिनिदादी हिंदू  की इच्छाशक्ति एवं दृढ़ मानसिकता को । शिवदास साधु (Siewdass Sadhu) (1903 - 1971 ) अद्वितीय प्रशंसा और भक्ति का उदाहरण देते हैं और त्रिनिदाद में अभी तक हिंदू समाज के सपनों और आकांक्षाओं का प्रतीक हैं। त्रिनिदाद का एक राष्ट्रीय नायक! हमेशा के लिए हमारे मन में शानदार ढंग से याद रहेगा। 
एक सदी पहले, Bhaarat (भारत), जिसका नाम आज त्रिनिदाद और टोबैगो में हिंदुओं के बीच भय (अंग्रेजो द्वारा बंधुवा मजदुर के रूप में लाने के कारण ) और श्रद्धा (हिन्दुओ की पुण्यभूमि) से भर देता है वहां पर श्री बुद्धराम और श्रीमती बिसुन्दिया के घर 1 जनवरी, 1903 को शिवदास जी का जन्म हुआ था।  चार के उम्र में, वह एक नए देश में अपने माता - पिता और दो छोटे भाइयों के साथ अंग्रेजो द्वारा पानी के जहाज में बंधुवा मजदूरी के लिए लाये गए । लोटा और रामचरित मानस दो चीजें 150 वर्ष पूर्व एक पूंजी के रूप में बंधुवा मजदूर अपने साथ ले गए थे।शिवदास जी के परिवार को सेंट्रल त्रिनिदाद में वाटरलू संपदा पर मेहनत मजदूरी के लिया लगाया गया । 
 
शिवदास जी Barrancore ग्राम में रहे जिसे अब BRICKFIELD के रूप में आज जाना जाता है ।  माता - पिता की मृत्यु के बाद, शिवदास जी 1926 में पहली बार भारत आए। भारत में पैतृक गांव के पंडित (उम्र के 120 साल) से आशीर्वाद प्राप्त किया।  शिवदास जी ने त्रिनिदाद आने से पहले पंडित जी के सामने एक मंदिर का निर्माण करने की प्रतिज्ञा कर ली । 1940, 1946, 1963 और 1970 चार और अवसरों पर भारत की यात्रा करी ।  
 
लंबे समय के  सपने को साकार करने के लिए शिवदास साधु, अक्टूबर 1947 में वाटरलू खाड़ी के किनारे पर कैरोनि (Caroni) लिमिटेड से जमीन का हिस्सा खरीदा और चार साल तक गांव और आसपास के  निवासियों के साथ मिलकर बंधुवा मजदूरी के बाद समय निकल कर भवन का निर्माण किया परन्तु जब १९५२ में मुर्तिया स्तापित की तो मंदिर ध्वस्त करने का अंग्रेज शाषन एवं कंपनी द्वारा आदेश दिया गया था भारी मन और उदास आँखों के साथ उन्होंने  भगवान के इस निवास को नष्ट करने से इनकार कर दिया। अनुपालन करने से इनकार तथा राज्य भूमि पर अतिक्रमण के लिए 400 डॉलर का जुर्माना के साथ 14 दिनों के लिए जेल में बंदी बनाकर रखा , और मंदिर ढहा दिया । अंग्रेज सरकार ने कहा कि भूमि पर मंदिर का निर्माण नहीं हो सकता है 
 उनकी रिहाई तत्काल बाद शिवदास साधु ने प्रण लिया "तुमने भूमि पर मंदिर तोड़ दिया, तो मैं समुद्र में एक मंदिर का निर्माण करूँगा "।  
17 साल तक शिवदास साधु अपने 'सागर में मंदिर "का निर्माण जारी रखा। अपने उपकरण सरल थे - दो बाल्टी और एक साइकिल। बाल्टी में वह पत्थर , बजरी और सीमेंट रखते और साइकिल के दो हैंडल पर बाल्टी ।  शिवदास साधु वाटरलू खाड़ी में समुद्र के किनारे  से कुछ 500 फीट दूर मंदिर निर्माण के लिए पर साइकिल पर धक्का लगाकर निर्माण सामग्री ले जाते थे । कभी कभी परिवार और ग्रामीणों ने उन्हें सहायता प्रदान की, लेकिन मोटे तौर पर यह लगभग एक एकल  प्रयास था । शुरूआत के काफी वर्षो तक लोग उन्हें पागल समझते थे कि भला समुद्र में मंदिर का निर्माण १ साइकिल के जरिये कैसे संभव है ? 

1970 में मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ, और शिवदास साधु का भारत की  तीर्थ यात्रा (1970 ) के बाद मंदिर की सेवा में शांति से 1971 में निधन हो गया।  1995 में मंदिर के बाहर उनकी पारंपरिक धोती, कुर्ता और माला पहने खड़े श्रद्धामय प्रणाम की मुद्रा में मूर्ति  का 5,000 हिंदुओं की उपस्तिथि  में अनावरण किया गया। 
त्रिनिदाद और दुनिया भर के हिंदुओं लिए इस धर्मवीर (धर्म के रक्षक) का अदम्य साहस, शक्ति और दृढ़ संकल्प  एक प्रेरणा का स्त्रोत है । 
"समुद्र में मंदिर" आज धर्मवीर शिवदास साधु की एक स्थायी विरासत के रूप में गर्व से खड़ा है.







Sunday, July 27, 2014

Puranic history and importance of 12 Jyotirlings of Lord Shiva

12 ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा
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भगवान शिव की भक्ति का महीना सावन शुरू हो चुका है। शिवमहापुराण के अनुसार एकमात्र भगवान शिव ही ऐसे देवता हैं, जो निष्कल व सकल दोनों हैं। यही कारण है कि एकमात्र शिव का पूजन लिंग व मूर्ति दोनों रूपों में किया जाता है। भारत में 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग हैं। इन सभी का अपना महत्व व महिमा है।

ऐसी मान्यता भी है कि सावन के महीने में यदि भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए जाएं तो जन्म-जन्म के कष्ट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि सावन के महीने में भारत के प्रमुख 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। आज हम आपको बता रहे हैं इन 12 ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा-""

1- सोमनाथ

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चन्द्र देव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है।

2- मल्लिकार्जुन

यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं।

कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

4- ओंकारेश्वर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

5- केदारनाथ

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

6- भीमाशंकर

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर का दर्शन प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

7- काशी विश्वनाथ

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

8- त्र्यंबकेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

9- वैद्यनाथ

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड राज्य (पूर्व में बिहार ) के देवघर जिला में पड़ता है।

10- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

12- धृष्णेश्वर मन्दिर

घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों  में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

Friday, July 11, 2014

History behind Guru Poornima

**महर्षि वेदव्यास : भगवान के अवतार
गुरुपूर्णिमा पर होता है महर्षि वेदव्यास का पूजन

महर्षि वेदव्यास जी भगवान के अवतार हैं, वे अमर हैं। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है।

द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।

व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।

इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं।

सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की।

इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।

वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं। पुण्यात्मा भक्तों को उनके दर्शन भी हुए हैं।

Thursday, July 10, 2014

**परम गुरु--हिन्दू धर्म की गंगा: स्वामी रामकृष्ण परमहंस

**परम गुरु--हिन्दू धर्म की  गंगा
स्वामी रामकृष्ण परमहंस

गदाधर से सनातन परंपरा की साक्षात प्रतिमूर्ति रामकृष्ण परमहंस बनने तक की साधना पूरी करके दुनिया को चमत्कृत कर देने वाले ऐसे महात्मा रामकृष्ण परमहंस के जीवन-चरित से प्रेरणा लेकर अपना जीवन आलोकित करने की दिशा में प्रशस्त हों....।

रामकृष्ण बहुत-कुछ अनपढ़ मनुष्य थे, स्कूल के उन्होंने कभी दर्शन तक नहीं किए थे। वे न तो अंग्रेजी जानते थे, न वे संस्कृत के ही जानकार थे, न वे सभाओं में भाषण देते थे, न अखबारों में वक्तव्य। उनकी सारी पूंजी उनकी सरलता और उनका सारा धन महाकाली का नाम-स्मरण मात्र था।

दक्षिणेश्वर की कुटी में एक चौकी पर बैठे-बैठे वे उस धर्म का आख्यान करते थे, जिसका आदि छोर अतीत की गहराइयों में डूबा हुआ है और जिसका अंतिम छोर भविष्य के गहवर की ओर फैल रहा है। निःसंदेह रामकृष्ण प्रकृति के प्यारे पुत्र थे और प्रकृति उनके द्वारा यह सिद्ध करना चाहती थी कि जो मानव-शरीर भोगों का साधन बन जाता है, वही चाहे तो त्याग का भी पावन यंत्र बन सकता है।

द्रव्य का त्याग उन्होंने अभ्यास से सीखा था, किन्तु अभ्यास के क्रम में उन्हें द्वंदों का सामना करना नहीं पड़ा। हृदय के अत्यंत निश्छल और निर्मल रहने के कारण वे पुण्य की ओर संकल्प-मात्र से ब़ढ़ते चले गए। काम का त्याग भी उन्हें सहज ही प्राप्त हो गया। इस दिशा में संयमशील साधिका उनकी धर्मपत्नी माता शारदा देवी का योगदान इतिहास में सदा अमर रहेगा।
घर बैठे उन्हें गुरु मिलते गए। अद्वैत साधना की दीक्षा उन्होंने महात्मा तोतापुरी से ली, जो स्वयं उनकी कुटी में आ गए थे। तंत्र-साधना उन्होंने एक भैरवी से पाई जो स्वयं घूमते-फिरते दक्षिणेश्वर तक आ पहुंची थीं। उसी प्रकार इस्लामी साधना के उनके गुरु गोविन्द राय थे जो हिन्दू से मुसलमान हो गए थे। और ईसाइयत की साधना उन्होंने शंभुचरण मल्लिक के साथ की थी जो ईसाई धर्म के ग्रंथों के अच्छे जानकार थे।

सभी साधनाओं में रमकर धर्म के गूढ़ रहस्यों की छानबीन करते हुए भी काली के चरणों में उनका विश्वास अचल रहा। जैसे अबोध बालक स्वयं अपनी चिंता नहीं करता, उसी प्रकार रामकृष्ण अपनी कोई फिक्र नहीं करते थे। जैसे बालक प्रत्येक वस्तु की याचना अपनी मां से करता है, वैसे ही रामकृष्ण भी हर चीज काली से मांगते थे और हर काम उनकी आज्ञा से करते थे। कह सकते हैं कि रामकृष्ण के रूप में भारत की सनातन परंपरा ही देह धरकर खड़ी हो गई थी।

दरसअल, उन्होंने साधनापूर्वक धर्म की जो अनुभूतियां प्राप्त की थीं, कालांतर में स्वामी विवेकानंद ने उनसे व्यावहारिक सिद्धांत निकाले। रामकृष्ण अनुभूति थे, विवेकानंद उनकी व्याख्या बनकर आए। रामकृष्ण दर्शन थे, विवेकानंद ने उनके क्रियापक्ष का आख्यान किया। रामकृष्ण और विवेकानंद एक ही जीवन के दो अंश, एक ही सत्य के दो पक्ष थे।

स्वामी निर्वेदानंद ने रामकृष्ण परमहंस को हिन्दू धर्म की गंगा कहा है, जो वैयक्तिक समाधि के कमंडलु में बंद थी। स्वामी विवेकानंद इस गंगा के भागीरथी हुए और उन्होंने देवसरिता को रामकृष्ण के कमंडलु से निकालकर सारे विश्व में फैला दिया। वस्तुतः हिन्दू धर्म में जो गहराई और माधुर्य है, रामकृष्ण परमहंस उसकी प्रतिमा थे। उनकी इन्द्रियां पूर्ण रूप से उनके वश में थीं।

रक्त और मांस के तकाजों का उन पर कोई असर न था। सिर से पांव तक वे आत्मा की ज्योति से परिपूर्ण थे। आनंद, पवित्रता और पुण्य की प्रभा उन्हें घेरे रहती थी। वे दिन-रात परमार्थ- चिन्तन में निरत रहते थे। सांसारिक सुख-समृद्धि, यहां तक कि सुयश का भी उनके सामने कोई मूल्य नहीं था।

रामकृष्ण परमहंस के वचनामृत की धारा जब फूट पड़ती थी, तब बड़े-से- बड़े तार्किक अपने- आपमें खोकर मूक हो जाते थे। उनकी विषय प्रतिपादन की शैली ठीक वही थी जिसका आश्रय भारत के प्राचीन ऋषियों पार्श्वनाथ, बुद्ध और महावीर ने लिया था, और जो परंपरा से भारतीय संतों के उपदेश की पद्धति रही है।

वे तर्कों का सहारा कम लेते थे, जो कुछ समझाना होता उसे उपमाओं और दृष्टांतों से समझाते थे। संत सुनी-सुनाई बातों का आख्यान नहीं करते, वे तो आंखों-देखी बात कहते हैं, अपनी अनुभूतियों का निचोड़ दूसरों के हृदय में उतारते हैं। ऐसे सनातन परंपरा की साक्षात प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले महात्मा रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर उन्हें नमन।

ऐसे गुरु को गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर नमन ।

Wednesday, July 2, 2014

विरक्त सन्त : स्वामी रामसुखदास जी

3 जुलाई/पुण्य-तिथि

विरक्त सन्त    : स्वामी रामसुखदास जी

धर्मप्राण भारत में एक से बढ़कर एक विरक्त सन्त एवं महात्माओं ने जन्म लिया है। ऐसे ही सन्तों में शिरोमणि थे परम वीतरागी स्वामी रामसुखदेव जी महाराज। स्वामी जी के जन्म आदि की ठीक तिथि एवं स्थान का प्रायः पता नहीं लगता; क्योंकि इस बारे में उन्होंने पूछने पर भी कभी चर्चा नहीं की। फिर भी जिला बीकानेर (राजस्थान) के किसी गाँव में उनका जन्म 1902 ई. में हुआ था, ऐसा कहा जाता है।

उनका बचपन का नाम क्या था, यह भी लोगों को नहीं पता; पर इतना सत्य है कि बाल्यवस्था से ही साधु सन्तों के साथ बैठने में उन्हें बहुत सुख मिलता था। जिस अवस्था में अन्य बच्चे खेलकूद और खाने-पीने में लगे रहते थे, उस समय वे एकान्त में बैठकर साधना करना पसन्द करते थे। बीकानेर में ही उनका सम्पर्क श्री गम्भीरचन्द दुजारी से हुआ। दुजारी जी भाई हनुमानप्रसाद पोद्दार एवं सेठ जयदयाल गोयन्दका के आध्यात्मिक विचारों से बहुत प्रभावित थे। इस प्रकार रामसुखदास जी भी इन महानुभावों के सम्पर्क में आ गये।

जब इन महानुभावों ने गोरखपुर में ‘गीता प्रेस’ की स्थापना की, तो रामसुखदास जी भी उनके साथ इस काम में लग गये। धर्म एवं संस्कृति प्रधान पत्रिका ‘कल्याण’ का उन्होंने काफी समय तक सम्पादन भी किया। उनके इस प्रयास से ‘कल्याण’ ने विश्व भर के धर्मप्रेमियों में अपना स्थान बना लिया। इस दौरान स्वामी रामसुखदास जी ने अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों की रचना भी की। धीरे-धीरे पूरे भारत में उनका एक विशिष्ट स्थान बन गया।

आगे चलकर भक्तों के आग्रह पर स्वामी जी ने पूरे देश का भ्रमणकर गीता पर प्रवचन देने प्रारम्भ किये। वे अपने प्रवचनों में कहते थे कि भारत की पहचान गाय, गंगा, गीता, गोपाल तथा गायत्री से है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब-जब शासन ने हिन्दू कोड बिल और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिन्दू धर्म तथा संस्कृति पर चोट करने का प्रयास किया, तो रामसुखदास जी ने डटकर शासन की उस दुर्नीति का विरोध किया।

स्वामी जी की कथनी तथा करनी में कोई भेद नहीं था। सन्त जीवन स्वीकार करने के बाद उन्होंने जीवन भर पैसे तथा स्त्री को स्पर्श नहीं किया। यहाँ तक कि अपना फोटो भी उन्होंने कभी नहीं खिंचने दिया। उनके दूरदर्शन पर आने वाले प्रवचनों में भी केवल उनका स्वर सुनाई देता था; पर चित्र कभी दिखायी नहीं दिया।

स्वामी जी ने अपनी कथाओं में कभी पैसे नहीं चढ़ने दिये। उनका कोई बैंक खाता भी नहीं था। उन्होंने अपने लिए आश्रम तो दूर, एक कमरा तक नहीं बनाया। उन्होंने किसी पुरुष या महिला को अपना शिष्य भी नहीं बनाया। यदि कोई उनसे शिष्य बना लेने की प्रार्थना करता था, तो वे ‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम’ कहकर उसे टाल देते थे।

तीन जुलाई, 2005 (आषाढ़ कृष्ण 11) को ऋषिकेश में 103 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना शरीर छोड़ा। उनकी इच्छानुसार देहावसान के बाद गंगा के तट पर दो चिताएँ बनायी गयीं। एक में उनके शरीर का तथा दूसरी पर उनके वस्त्र, माला, पूजा सामग्री आदि का दाह संस्कार हुआ। इस प्रकार परम वीतरागी सन्त रामुसखदास जी ने देहान्त के बाद भी अपना कोई चिन्ह शेष नहीं छोड़ा, जिससे कोई उनका स्मारक न बना सके।

चिताओं की अग्नि शान्त होने पर अचानक गंगा की एक विशाल लहर आयी और वह समस्त अवशेषों को अपने साथ बहाकर ले गयी। इस प्रकार माँ गंगा ने अपने प्रेमी पुत्र को बाहों में समेट लिया।

Tuesday, November 19, 2013

Tradition of Hindu Saints, Seers and Sages from India.

Watch this excellent talk given by Prof. Kapil Kapoor on subject "De-subjugating Timeless Vocabularies – Swami Vivekananda as Intellectual Catalyst". He delivered this keynote talk at "International Conference on Swami Vivekananda" held at University of Southern California School of Religion

From Wikipedia, his bio is
Dr. Kapil Kapoor, (born November 17, 1940) is an Indian scholar of linguistics and literature and an authority on Indian intellectual traditions.[1] He is former Pro-Vice Chancellor of Jawaharlal Nehru University (JNU) and served as professor at Centre for Linguistics and English, and Concurrent Professor at Centre for Sanskrit Studies there before retiring in 2005.[2][3] He is Editor-in-Chief of the 11-Volume Encyclopedia of Hinduism published by Rupa & Co. in 2012.[4]
Highlights of the talk:

  • Did Swami Vivekananda came from vacuum ?  Bharat has time immemorial history of great Saints, Sages and Seer with impeccable geniusness.  Swami Vivekananda belong to the same tradition.
  • India faced hundreds of years of oppression from invaders. Few know about Hindu swami's contribution and their works to keep the Sanatan Dharma alive.
  • Before Britishers destroyed India's education system India had schools in each village. Only 12% of the teachers were Brahmins and literacy rate was high as all used to go to school.
  • Due to abduction of mature girls by Muslims in Bengal, to safeguard their daughter parents used to marry their daughters in younger age. This led to many young widows in the society at that time.
  • Raja Ram Mohan Roy and Keshav Chandra Sen could give only calibrated response to western challenges to the Sanatan Dharma.
  • Ishwar Chandra Vidyasagar stood up and stressed that Hindu Philosophy can rise from within, it don't to borrow any western paradigms. He had only one son and he married him with a widow.
  • Swami Dayananda Saraswati not only firmed people's belief in Sanatan Dharma but also wrote critique (Satyarth Prakash) to Abrahamic faiths. Swami Dayananda Saraswati told, their (Abrahamic faiths) own system need reforms. He took philosophical battle to the other camp.
  • Vyas Parampara - tradition of reconstitution the knowledge lost. With that Veda were always preserved and are live document.
  • Sage Yaska (5-6BCE) was the first (as per recorded History) Rishi who defended the Veda and proved Vedic Mantras are not meaningless. One need to read and interpret to understand the Vedic Mantras. He created methodology of interpretation.
  • Adi Sankaracharya countered challenges put up to Sanatan Dharma by Buddhism. His response in the form of Shastra (a rich commentary on Upanishads and Vedas). He given pravachan (discourses) to common people and instilled pride for Sanatan Dharma. Shankara's commentary originated through the discourses he delivered to the villagers. 
  • Guru Gorakhnath (Gou-Raksh-Nath, the one who protected the holy cows) started Nath Jogi Sampraday (Traditions of warrior saints). Guru Gorakhnath and warrior, martial Gorkha (Gou-Raksha) sadhus countered Islamic conversions put forward by Sufis and Swords. Sufis did more conversion than what was done by Islamic sword. He composed his writings in Sanskrit and also local languages so that it can widespread.
  • 10th Sikh Guru Gobind Singh also countered Mogul's oppressions, atrocities and conversions. He formed martial Khalsa Panth. Guru Gobind Singh was a poet, scholar and great saint. He tooks Shastra (शस्त्र ) along with  Shastra (शास्त्र ) for defence. He rewrote Krishnavtar and Ramavatar in Braj Bhasha.
  • Swami Vivevkananda belong to the same great tradition where above saints are part of. Swami Vivevkananda took all the questions from Abrahamic faith and defended Sanatan Dharma. He was not only a voice for Hindus, he was a voice for Asia.

Thursday, June 20, 2013

"American Veda" Author Philip Goldberg invites all to Dharma and Yoga Fest 2013, Los Angeles.

Philip Goldberg is well known spiritual counselor, interfaith minister, workshop leader, author of American Veda, Roadsigns, The Intuitive Edge, and other books. He is member of advisory committee of Dharma Yoga Fest, 2013 Los Angeles. He invites all the Dharma Followers in Southern California to come to the this wonderful fest.
More on the DYF at http://dharmayogafest.org/la

Tuesday, June 4, 2013

Dharma and Yoga Fest celebration planned across USA

The Hindu Swayamsevak Sangh is organizing a Dharma and Yoga Fest at various cities across USA with participation of many Dharmik Organizations.HSS is  inviting all Dharma-centered groups to participate in the event.
Dharma and Yoga Fest event will commemorate Swami Vivekananda’s 150th birth anniversary in 2013 by celebrating his vision of “Universal Peace Through Dharma and Yoga.”
The Dharma and Yoga Fest will include a variety of activities, such as  Hatha Yoga demonstration, a seminar on Dharma and Yoga, Kirtan, Bhajan, Satsang, and crafts and games for children. The event will endeavor to create a sense of harmony, mutual respect, and spiritual oneness.
Renowned author Philip Goldberg who wrote best selling book http://americanveda.com/ has shared his message on this Dharma and Yoga Fest.

Swami ji’s uniquely advanced Dharma in the modern era. The ideas introduced by him to America, such as Yoga, Karma, and the spiritual oneness of humanity, continue to have a growing appeal. This has also led to the popularity of practices such as Haṭha Yoga, Āyurveda, and meditation. The Dhārmika concept of the plurality of spiritual paths invoked by Swami ji in his Chicago Address finds continuing relevance even today in resolving religious conflict.
The Dharma and Yoga Fest forms the finale of our year-long commemoration of Swami ji in 2013. Other events have included a nationwide “Yoga Day” coinciding with Swami ji’s birthday on January 12; a nationwide DharmaBee™ quiz contest for children; programs for high school and college students, such as a traveling exhibit on Swami ji’s life visiting major university campuses and “Vacation with Vivekananda” excursions to locations where Swami ji visited during his travels in the United States; and local social service projects by children and adults alike.

To find out local event at your city go to http://dharmayogafest.org/
Flyer for Los Angeles is attached below.

Tuesday, April 9, 2013

Hindu Calender's legacy to Western calender.

Today Western Calender is quite popular and is de-facto civil calender. Many of us know that western calender is changed many times in history. But only few are aware that the present day calender also is borrowed from Hindu Calender system and still have legacy of it.
Untill 1752 the new year used to begin in March. Which conform with Hindu Calender, Hindu New year usually begin in March/April (based on planetary movements).

Look at below table , four of the Western months are still linked to Hindu Calender system.
Month Number
(Hindu
Calender)
Months – (Hindu Calendar)
Month – (Western Calendar)
Sanskrit translation to Western Months
Meaning
1
Chaitra
March


2
Vaisakha
April


3
Jyestha
May


4
Asadha
June


5
Shravan
July


6
Bhadrapad
August


7
Ashwin
September
7th monthly change in sky.
8
Kartik
October
8th monthly change in sky.
9
Margshirsha
November
9th monthly change in sky.
10
Pausha
December
10th monthly change in sky.
11
Magha
January


12
Phalguna
February




There is an excellent research done on comparison of Hindu calender v/s Roman calender
Read excerpts (p183) from the paper "Indian vis-a-vis Roman calender" , on concept of Year.

In Sanskrit the most popular word for year is Varsa meaning "that which rains, that is , rainy season".Therefore it seems that originally one rainy season to another counted one year.
Thus, a Hindu year is related to the cycle of seasons while the Christian or even Mohammedan year has not such relation.




The paper "The Calendars of India" have detailed study on Calenders originated in India.
Read "British Calendar Act of 1751" when new year changed from March to January form 1752.